नेपाल और उत्तराखंड की समानता दर्शाता एक पर्व – नेपाल का तिहार और भैली


  • Written By - Umesh Kumar Published On Nov 17, 2019

पहाड़ों में दीपावली का पर्व केवल महालक्ष्मी पूजन तक ही नहीं होता है बल्कि ये तो धनतेरस से भी पहले शुरू हो जाता है और भाई दूज के बाद भी रहता है। इसी प्रकार नेपाल में भी तिहार यानि दिवाली का उत्सव कई दिनों तक चलता रहता है, हर दिन कुछ न कुछ महत्वपूर्ण घट रहा होता है। धनतेरस से लेकर भाई दूज के बाद तक, यहाँ हर रोज त्यौहार का उत्साह जरा भी कम नहीं होता है। धनतेरस के दिन सभी लोग बड़े चाव से खरीददारी करते हैं और इसके अगले दिन यहाँ होता है ‘काग तिहार’ जिसमें कौवों की पूजा की जाती है इस दिन कौवों को भोग लगाया जाता है जो कि सीमा के उस पार नेपाल और इस पार भारत में समान रूप से हमारी आस्थाओं का परिदर्शक है। और इसके बाद आता है ‘कुकुर तीहार’ का दिन और इस दिन सभी लोग कुत्तों की पूजा करते हैं और कुत्तों को पूजे जाने के पीछे की वजह भी बड़ी रोचक है, यहाँ माना जाता है कि पांडवों के स्वर्गारोहण के समय देवराज इंद्र ने श्वान यानि कुत्ते का रूप धारण किया और पांडवों को स्वर्ग लेकर गए, तथा हिमालय के क्षेत्रपाल भैरव का वाहन भी श्वान ही है, इसी वजह से यहाँ कुत्तों की पूजा अत्यंत ही महत्वूर्ण मानी जाती है इसके बाद ‘गौ तिहार’ और लक्ष्मी पूजा और इसके बाद गोवर्धन पूजा संपन्न होती है। और इसके बाद यहाँ तिहार के अंतिम दिन द्वितीया तिथि को भाई टीका यानि भैय्या दूज मनाया जाता है और इसी के साथ शुरू होती है भैली, भैली को नेपाली में बेशक भैली लिखा जाता है लेकिन इसका उच्चारण भईलि जैसा किया है। Card Image भैली -: दिवाली के इस पर्व के दौरान पहाड़ो में अनेक रीति रिवाज संपन्न होते हैं जो हमारे समाज को एकजुट बनाये रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नेपाल में ऐसा ही एक रिवाज बड़ी गर्मजोशी से मनाया जाता है जिसे भैली कहा जाता है। भैली मानाने के पीछे की वजह बेहद रोचक है कहा जाता है कि यक्ष राज राजा बलि जिनसे भगवन विष्णु ने तीन पग भूमि मांगी और दो क़दमों में सारा संसार नाप लेने के बाद जब तीसरा पैर रखने की भूमि के लिए विष्णु ने स्थान माँगा तो राजा बलि ने उनसे अपने सिर पर पैर रखवाया और स्वयं पाताल में समां गए लेकिन भगवान विष्णु ने उनसे प्रसन्न होकर दिवाली के बाद कुछ समय के लिए राजा बलि को धरती में वापस लौटने का वरदान दिया और पहाड़ों में राजा बलि के धरती पर आगमन का उत्सव भैली के नाम से मनाया जाता है “हामी आफई आयेनुव हूँ बलि राजा ले पठाये” इन पंक्तियों का अर्थ है कि यूँ ही नहीं आए हैं , हमें राजा बलि ने भेजा है। भैली गीत – “हरियो गोब्बरेले लीपे को लक्ष्मी पूजा गरे को हे आऊशी बारो गाई तिहारो ............. भैली हामी आफ़ई आयेनुव हूँ बलि राजा ले पठाये हे आऊशी को दिनो गाई तिहारो...........भैली” Card Image ऐसे ही गीतों के साथ ये भैली के दल नाचते गाते, मस्ती में झूमते हुए सभी के घरों में जाते हैं और सुख समृद्धि का आशीष देते हैं लेकिन भैली मनाते कैसे हैं आइये जानें - दिवाली के तुरंत बाद इस लोक परंपरा को सफल रूप देने के लिए क्या महिलायें क्या बच्चे क्या बुढ़ें क्या जवान हर वर्ग के लोग मिलकर अपने अपने दल बनाते हैं, और इन्हें भैल्यार कहा जाता है। और लक्ष्मी पूजा वाले दिन की शाम होते ही ये दल सक्रीय हो जाते हैं, सभी सज धज के तैयार, सभी के गलों में फूलों से बनी मालायें और हाथों में मादल {ढोलक के समान दिखने वाला नेपाली वाद्य},और खूब मस्ती और हर्षोल्लाश के साथ गाती बजाती ये टोलियाँ सभी के घरों में बारी बारी से पहुँचती हैं| और जिन घरों में ये टोलियाँ पहुँचती हैं उन घरों के निवासी मेजबान बन इन टोलियों का स्वागत बड़ी ही गर्मजोशी से करते हैं इन दलों का खूब आतिथ्य सत्कार करते हैं और फिर शुरू होता है महफ़िलों का दौर सभी लोग बड़े ही चाव से गाते बजाते हैं। और इसी बीच अपने पुराने दिनों को याद करते कुछ लोग आसानी से देखने मिल जातें हैं और वो बताते हैं कि इन उत्सवों ने कैसे हमारे समाजों को बांधे रखा है, और अपने दिनों में उन्होंने अनेकों कठिनाइयों के बावजूद इन उत्सवों के सफल संचालन के लिए कितनी मेहनत की है और ये किस्से नई पीढ़ी को सोचने का नया आयाम देती हैं। खैर इसी बीच भैल्यारोंऔर मेजबानों के बीच भी नाचने गाने का एक सिलसिला चलता है। और अंत में मेजबान भैली के दलों को भेंट में कुछ धन या उपहार इत्यादि अवश्य देते हैं, ये दान देना अत्यंत जरूरी समझा जाता है, इसके बाद भैली के दल मंगल गीत गाते हुए मेजबानों को सुभाशीष देकर अगले घर को चल देते हैं। इसमें सबसे महत्व्पूर्ण बात यह है कि भैली की यह परंपरा पुराने समय में उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में भी भैलो नाम से मनाई जाती थी। लेकिन अब ये वक्त की रेत में कहीं गायब सी हो गई है। और सिर्फ यही नहीं आधुनिकता के दौड़ में समाज को बाँधने वाली ऐसी परम्पराएँ लगातार कही पीछे छुटते जा रही हैं, आज जरुरत है कि हम इन रिवाजों को संजोएं ताकि हमारे बाद आने वाली पीढियां भी इन छोटे छोटे पलों को जी सके और आपस में एकजुट हो सकें।  

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