त्रिशूल पर्वत आरोहण के बाद मनीष कसनियाल से एक खास मुलाकात

त्रिशूल पर्वत आरोहण के बाद मनीष कसनियाल से एक खास मुलाकात


  • Written By - Admin Published On Oct 1, 2019

दिल्ली के दुर्गाबाई देशमुख मेट्रो स्टेशन से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन (Indian Mountaineering Foundation) का कैंपस। आई एम एफ के इसी कैंपस में देशभर के पर्वतारोही अपने आरोहण से पहले और बाद में आकर ठहरते हैं। इसी जगह पर हमारी मुलाकात हुई त्रिशूल पर्वत फतह करके लौटे पिथौरागढ़ के युवा पर्वतारोही मनीष कसनियाल। हमारी उनसे छोटी सी मुलाकात हुई और हमने उनसे त्रिशूल पर्वत के आरोहण से जुड़ी कुछ बातें जानीं।

मुलाकात से पहले मनीष दा ने हमें आईएमएफ का कैंपस घुमाया और पूरा कैंपस पर्वतारोहण के थीम पर बनाया गया है। खास पत्थरों से बिल्डिंग का डिजाइन है जो उसे पथरीला आभा देता है। आस पास राॕक गार्डन भी बना है। कैंपस में हरियाली भी अच्छा है, जो यह रहने के अनुभव को बढ़ा देता है। मनीष दा का स्वभाव काफी दोस्ताना है तो इस वजह से मालूम नहीं हुआ कि समय कैसे बीत रहा था। उसके बाद कुछ बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मनीष कसनियाल बड़े लम्बे बालों और दाड़ी रखें हुए हैं, पिथौरागढ़ में रेड क्राॕस के सक्रिय सदस्य हैं। इसी के साथ पिथौरागढ़ में पर्वतारोहण और साहसिक खेलों को बढावा देने वाली संस्था आइंस (Intrinsic Climbers and Explorers) के भी सदस्य है। पिथौरागढ़ में सामाजिक कार्य में सक्रिय रूप में भागीदारी रखने वाले मनीष कसनियाल ने हाल ही में 7120 मीटर ऊंचे त्रिशूल पर्वत 1 का सफलतापूर्वक आरोहण किया।

मनीष कसनियाल आईएमएफ के प्री एवरेस्ट मैसिफ अभियान के तहत त्रिशूल पर्वत आरोहण करने वाली 53 सदस्यी टीम का हिस्सा थे। 28 अगस्त को दिल्ली से देहरादून रवाना हुई यह टीम सुतोल फ़िर लाताकोपड़ी से होते हुए त्रिशूल बेस कैम्प पहुंची। त्रिशूल बेस कैम्प में इनको पाँच टीमों में बाँटा गया।‌ टीम में बँटने के बाद लोड फेरी के सत्र शुरू हुए। कैंप 1 से कैंप 2 फिर कैंप 3 उसके बाद वापस इसी तरीके से लगातार कुछ दिनों तक सभी लोगों को उस चोटी के वातावरण अनूकूल ढाला गया जिससे किसी की सेहत पर बुरा असर ना पड़े। इस प्रकार से करीबन 20 दिन करने के बाद सभी टीम त्रिशूल पर्वत को फतह करने को तैयार थी। 15, 16, 17, 18, 19 को सभी टीम ने एक एक करके त्रिशूल पर्वत की चढ़ाई करनी थी। मनीष दा बताते हैं कि पहले तीन दिन मौसम अनूकूल था। पर्वतारोहियों को किसी अप्रत्याशित मौसम बदलाव का सामना नहीं करना पड़ा परन्तु आखिरी दो दिनों में हवाएँ काफी तेज थीं और मौसम बिगड़ चुका था। इस वजह से चौथी टीम जिसने 18 सिंतबर को ट्रैक किया वह त्रिशूल पर्वत के शिखर पर पहुंचने से 250 मीटर दूर रह गई। मौसम के बिगड़ते हालात को देखकर टीम ने वापस लौटना पड़ा। मनीष दा पाँचवीं टीम का हिस्सा थे, किसी को भी मालूम नहीं था कि उनके दिन में मौसम के हालात क्या रहेंगे। मनीष दा बोल रहे थे कि वे उम्मीद कर रहे थे कि मौसम सामान्य हो जाए। परन्तु हालात देखकर लग रहा था कि मौसम में कोई बदलाव नहीं आएगा। अगली सुबह मौसम वैसा ही था, उसके बावजूद टीम ने ट्रैक शुरू करने का निर्णय लिया और यह तय हुआ कि ऊपर जाते हुए मौसम और बिगड़ता है तो यह टीम भी वापस आ जाएगी।

मनीष दा यह बताते हुए खिल गए कि उनकी उम्मीदें सार्थक हो रही थी, दिन होते होते मौसम सामान्य होने लगा। जिसके बाद ट्रैक को पूरा किया गया। मनीष दा कहते हैं कि त्रिशूल पर्वत के आरोहण का सपना उन्होंने 2014 में देखा था, इस पर्वत को देखकर उन्हें हमेशा इसरा मन इसपर चढ़ने को मचलता था। मनीष दा की टीम ने 7120 मीटर की ऊंचाई पर राष्ट्र गान जन गण मन भी गाया। उस शिखर पर भारत का राष्ट्रगान गाना किसी भी भारतीय की दिल की धड़कनें तेज़ कर देगा। इस गर्व के पल को याद करते हुए मनीष दा इसे अपने लिए 'नई ऊचाईयां' कहते हैं। और बताते हैं कि अभी और भी ऊचाईयां बाकि है जिससे जनपद और राज्य ही नहीं, देश का नाम रोशन हो सके।

बातचीत के दौरान हमारी मुलाकात पिथौरागढ़ की नन्दा से भी हुई। नन्दा भी आईएमएफ की प्री एवरेस्ट मैसिफ अभियान का हिस्सा थी। उन्होंने भी त्रिशूल पर्वत का आरोहण कर एक नया कीर्तिमान दर्ज किया है। इस सफल आरोहण के बाद नन्दा त्रिशूल पर्वत फतह करने वाली उत्तराखंड की पहली महिला बन चुकी हैं।

इस बातचीत के बाद मनीष दा ने हमें आईएमएफ का म्यूजियम दिखाया। म्यूजियम में पर्वतारोहण से सम्बंधित हर प्रकार के पुराने व नए उपकरण मौजूद थे। पर्वतारोहण और पर्वतारोहियों से सम्बंधित जानकारी भी इस म्युजियम में मौजूद थी। हिमालय की तस्वीरें, मैप और चित्र भी इस म्युजियम में आकर्षित कर रहे थे। इस म्युजियम में नैन सिंह रावत और किशन सिंह रावत दोनों भाईयों को पर्वतारोहण क्षेत्र में मार्ग निर्माता के तौर पर दिखाया गया था। पिथौरागढ़ के इस अद्वितीय खोजकर्ता, सर्वेयर और मानचित्रकार का हिमालयी भौगोलिक खोज में विशेष योगदान था। 19वीं सदी में ही नैन सिंह ने हिमालय में हजारों किलोमीटर चलकर हिमालय के नक्शे तैयार किए व बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई। नैन सिंह रावत की किताबें व डायरियां पर्वतारोहियों के लिए पवित्र ग्रंथ हैं। आईएमएफ म्यूजियम में यह डायरी मौजूद थी, साथ ही 2004 में नैन सिंह रावत के सम्मान में जारी की गई डाक निकट भी रखी गई है। हिमालय के बारे में जानकारी के लिए यह संगत स्थान है। बात करते हुए मनीष दा ने बताया कि उत्तराखंड सरकार व उत्तराखंड के लोगों के द्वारा नैन सिंह रावत को वह सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वह हकदार हैं। मनीष दा कहते हैं कि नैन सिंह के जन्मदिवस के अवसर पर वह एक पर्वतारोहण फेस्टिवल के आयोजन का सपना देखते हैं जिसमें युवाओं को साहसिक खेलों से जोड़ने के साथ नैन सिंह रावत जैसे महान खोजकर्ता से भी परिचित कराया जाएगा। आईएमएफ में म्यूजियम के साथ एक लाइब्रेरी भी हैं जहाँ पर्वतारोहण से सम्बंधित बहुत किताबें और मैग्ज़ीन हैं। मनीष दा ने यहाँ से मुझे हिमालय का एक चित्र भेंट किया।

इस सब में समय कैसे गुजरा मुझे मालूम नहीं चला। शाम से रात हो चली थी। जाने का वक्त था और इस वक्त मेरी किस्मत मेरे साथ थी। मैंने मनीष दा से उनके गुरू श्री लवराज सिंह धर्मसक्तू जी से मिलाने का अनुरोध किया था, परन्तु व्यस्तता के कारण वह मौजूद नहीें थे। शाम को जाते वक्त किसी प्रकार से मेरी मुलाकात उनसे भी हो गई। धर्मसक्तू जी भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं और उनके नाम सात बार एवरेस्ट चढ़ने का भारतीय रिकार्ड है। उनका स्वभाव सच में यथार्थवादी था और उनका जमीन से जुड़ाव उनकी बातों में झलक रहा था। मनीष दा ने मुझे भेंट में कुछ चीज़ें दी हैं जिसके लिए शुक्रिया व सीटी पिथौरागढ़ की पूरी टीम की ओर से बहुत शुभकामनाएं। उम्मीद है आप इसी तरह से जिले का नाम रौशन करते रहेंगे और हमें इस प्रकार की मुलाकात का अवसर देते रहेंगे।

आपको बता दें कि जल्द ही आप सीटी पिथौरागढ़ के यूट्यूब चैनल पर मनीष कसनियाल के साथ एक वीडियो इंटरव्यू भी देख पाएंगे जिसमें उनकी और कुछ कहानियों और अनुभव से आपका परिचय करवाएंगे।

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