विश्व महिला दिवस : एक दिन उनके लिए जिनसे हम हैं


  • Written By - Deepak Upreti Published On Mar 8, 2020

आज एक ख़ास दिन है, एक अवसर है उस सदियों से शोषित तबके के प्रति प्रेम, प्रशंशा, सम्मान और अपनापन व्यक्त करने का। वही तबका जिसका हमारा पुरुष प्रधान समाज सदियों से शोषण तथा मनचाहे उपयोग करता आया है, ये भूलकर की बिना उनके न इस जीवन का कोई आधार है न कोई बुनियाद।
आज अंतरास्ट्रीय महिला दिवस है, एक दिन महिलाओं के लिए जब महिलाओं के सामजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में हासिल की गयी उपलब्धियों के प्रति सम्मान दर्शया जाता है। आज देश, दुनिया भाषा तथा संस्कृति और रहन सहन से परे सभी महिलायें एक हैं। बात करें इसके इतिहास की तो कहा जाता है की इसकी उपज मजदूर आन्दोलन से हुई, वर्ष 1908 में जब 15 हज़ार महिलाओं ने पुरूषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर न्यू यॉर्क शाहर में नौकरी के घंटे कम करने की मांग को लकर मार्च निकाला तो इसी के सम्मान में एक वर्ष के बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी द्वारा यह दिवस सबसे पहले 28 फरवरी 1909 को मनाया गया, परन्तु महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता मिली वर्ष 1975 में जब सयुंक्त राष्ट्र ने इसे वार्षिक तौर पर एक थीम के साथ मानना शुरू किया। तबसे लेकर आज तक हर वर्ष हम एक दिन महिलाओं को समर्पित किया जाता है जो है 8 मार्च, पर यही तारिख क्यों ? 1917 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की महिलाओं ने ‘ब्रेड एंड पीस’ यानि रोटी और शांति की मांग की और एक तरह का आन्दोलन शुरू कर दिया कहा जाता है रूस में राजतंत्र का तख्ता गिराने में इस आन्दोलन की आहम भूमिका रही और फिर अंतरिम सरकार ने महिलाओं को मताधिकार दे दिया। उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर का प्रयोग होता था जिसके अनुसार आन्दोलन के शुरुआत की तारिख 23 फरवरी थी परन्तु ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 8 मार्च वह तारीख थी जब यह आन्दोलन शुरू हुआ इसीलिए सयुंक्त राष्ट्र द्वारा 8 मार्च को महिला दिवस मनाया गया।
यह तो रही इसके इतिहास की बात अब सवाल यह उठता है की आज हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति कैसी है ? हमारा पुरुष प्रधान समाज क्या अपनी सदियों की संकीर्ण मानसिकता को आज बदल पा रहा है ? कहने वाले कह रहे हैं की आब तो आधुनिक समय आ गया है, महिलाए आज पुरुषो से कही कम नहीं हैं और कई क्षेत्रों में तो पुरुषों से आगे भी हैं कुछ हद तक यह बाते सत्य भी हैं परन्तु आज भी महिलाओं का एक बड़ा तबका जो अधिकाँश पिछड़े ग्रामीण वर्ग में आता है आज भी मौलिक अधिकारों तक से वंचित हैं Iहमारे पहाड़ों में तो स्थिति और भी सोचनीय है, आज भी पहाड़ों के कई ग्रामीण तथा अति ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति वही है जो शायद दशकों पहले थी। आज भी महिलाओं का एक बड़ा तबका शिक्षा तक से वंचित है, इतिहास पर नजर डालें तो सभी सामजिक कुप्रथाओं तथा कुरीतियों के खिलाफ लड़ने में महिलाओं का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा ही रही है, जब जब महिलाये शिक्षित हुई हैं उन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई है और सामाजिक कुप्रथाओं को तोडा है। इस बात में कोई दोहराई नहीं की आज परिस्थितिओं में काफी सारे सकारात्मक बदलाव हुए हैं, महिलाओं में साक्षरता दर काफी बढ़ा है और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से महिलाएं सशक्त हुई हैं। परन्तु आज भी जो सबसे बड़ा मुद्दा महिलाओं के लिए और हमारे समाज के लीए है वह है महिला सुरक्षा, अपने रोज़मर्रा के जीवन में न जाने कितनी बार कितनी ही महिलायें छेड़-छाड़ तथा छींटाकशी का शिकार होती है, हमारा राष्ट्र आज सबसे अधिक बलात्कार प्रभावित देशों की श्रेणी में आता है, एक राष्ट्र तथा समाज के तौर पर यह बहुत ही शर्मनाक है। आज भी हमारे देश के कई राज्यों में लिंगानुपात दर गिरता ही जा रहा है, कई राज्यों में तो यह भयावह स्थिति में पहुँच गया है। सरकार समय समय पर नयी नयी योजनाओं को लागू करती है जिससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिले तथा लिंगानुपात की गिरावट में कमी आये। परन्तु सरकार प्रशाशन चाहे कितनी ही योजनाये बना ले कितने ही कदम उठा ले, महिलाओं को पूरी तरह से आज़ादी तथा सुरक्षा तब तक नही मिलेगी जब तक हम सब अपनी संकीर्ण मानसिकता और पुरुष प्रधान सोच नहीं बदलेंगे। केवल एक दिन महिलाओं को समर्पित कर उनके गुणगान कर, सोशल मीडिया में पोस्ट और कमेंट्स करके स्थिति नहीं बदलेगी, स्थिति तभी बदलेगी जब महिलाए खुद आगे आकर अपने अधिकार और अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाएंगी, केवल पढ़ लिख कर नहीं अपितु जब हम अपने बेटे बेटियों को शिक्षित करेंगे जहाँ स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उन्हें मौलिक शिक्षा भी दी जाएगी, जब वे एक दुसरे का सम्मान करना सीखेंगे तभी शायद एक सुरक्षित तथा समानता युक्त समाज बन पाएगा।

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